राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या वृद्धि को स्वीकृति प्रदान

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) करने की स्वीकृति दी है। यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 के प्रख्यापन के माध्यम से लागू किया गया है।
    • इस प्रस्ताव को संसद के आगामी सत्र में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन के माध्यम से लागू किया जाएगा।

संवैधानिक प्रावधान

  • संविधान का अनुच्छेद 124(1) संसद को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने और बढ़ाने का अधिकार देता है।
  • संविधान में प्रारंभिक रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम सात न्यायाधीशों का प्रावधान था, जिससे भविष्य में विस्तार की लचीलापन सुनिश्चित हो सके।
  • यह संवैधानिक व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक और विधिक मांगों के अनुरूप न्यायिक क्षमता को अनुकूलित करने की आवश्यकता को दर्शाती है।

सर्वोच्च न्यायालय की संख्या का विकास

  • सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 ने प्रारंभिक रूप से न्यायाधीशों की संख्या 10 (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) निर्धारित की थी।
  • 1960 संशोधन द्वारा संख्या 13 और 1977 संशोधन द्वारा 17 कर दी गई।
  • बाद के संशोधनों द्वारा संख्या क्रमशः बढ़ाई गई और 2019 संशोधन द्वारा इसे 33 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) किया गया।

संख्या में वृद्धि का औचित्य

  • मामलों की लंबित संख्या में वृद्धि: वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में 92,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जो गंभीर बैकलॉग को दर्शाता है।
    • महामारी के बाद ई-फाइलिंग और डिजिटल तंत्रों के परिचय से मामलों का प्रवाह बढ़ा है।
  • न्यायिक रिक्तियाँ और सेवानिवृत्तियाँ: वर्तमान रिक्तियों ने न्यायाधीशों की प्रभावी कार्यशील संख्या को कम कर दिया है।
    • 2026 में कई न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं, जिससे न्यायिक क्षमता पर और दबाव पड़ेगा।
  • अधिकार क्षेत्र और कार्यभार का विस्तार: सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक मामलों, अपीलीय अधिकार क्षेत्र और जनहित याचिकाओं से संबंधित है। शासन एवं विधिक विवादों की बढ़ती जटिलता ने न्यायालय के कार्यभार को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा दिया है।
  • सुधार अभियान: न्यायिक संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर विधि आयोग (120वीं और 245वीं रिपोर्ट) ने बल दिया है और इसे ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सुदृढ़ किया, जिसमें उच्चतर न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात की अनुशंसा की गई।

चिंताएँ

  • न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं: केवल संख्या बढ़ाने से लंबित मामलों की समस्या का समाधान नहीं होगा।
  • संरचनात्मक बाधाएँ: सीमित न्यायालयीन अवसंरचना और प्रशासनिक क्षमता दक्षता को प्रभावित करती है।
  • मामला प्रबंधन संबंधी समस्याएँ: बार-बार स्थगन जैसी प्रक्रियात्मक देरी बैकलॉग में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
  • मामलों का केंद्रीकरण: बड़ी संख्या में अपीलें सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचती हैं, जिससे उसका ध्यान मूल संवैधानिक कार्यों से भटकता है।

आगे की राह

  • प्रौद्योगिकी के उपयोग से मामला प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ करना मामलों के निपटान की दक्षता बढ़ा सकता है।
  • मध्यस्थता और पंचाट जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा देना न्यायालयों पर भार कम कर सकता है।
  • मामलों के प्रवाह का युक्तिकरण, विशेषकर विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) का, सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता कर सकता है।
  • निचली न्यायपालिका और उच्च न्यायालयों की क्षमता बढ़ाना सभी स्तरों पर लंबित मामलों के समाधान हेतु आवश्यक है।

स्रोत: AIR

 

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